इस लेख में हमने एक सामान्य इंसान के नजरिए से धर्म को समझने का प्रयास किया है। साथ ही हमने बहुत संक्षिप्त में धर्म के वास्तविक अर्थ को समझाया है।
धर्म को लेकर लोगों के विचार

अगर आपसे पूछा जाए कि ‘धर्म’ क्या होता है, तो आप में से कुछ लोग कहेंगे, धर्म का मतलब – भगवान की पूजा करना, अल्लाह की इबादत करना, गॉड की प्रेअर करना, आदि।
कुछ कहेंगे, धर्म का मतलब – हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, आदि।
कुछ कहेंगे, धर्म का मतलब – भक्ति-भजन, यज्ञ-हवन करना, नमाज़ पढ़ना, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, तीर्थ, हज आदि को जाना।
कुछ कहेंगे, धर्म का मतलब – वेद-पुराण, गीता, कुरान, बाइबल, गुरु ग्रन्थ साहिब, आगम सूत्र, त्रिपिटक, तोराह, आदि ग्रंथों को पढ़ना।
कुछ कहेंगे, धर्म का मतलब – श्री राम, श्री कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव, ईसा मसीह, संत- महात्माओ के वचनों पर चलना।
कुछ कहेंगे, धर्म का मतलब – माता-पिता, बुजुर्गों की सेवा करना, सभी जीवों से प्रेम करना, किसी को बुरा-भला न कहना, झूट न बोलना, किसी की निंदा न करना, आदि।
हम जिससे भी धर्म का अर्थ पूछेंगे, हमे हमेशा अलग जवाब ही मिलेगा।
अब आप सोच रहे होंगे कि यहाँ तो धर्म इतने अलग अलग अर्थ है। तो आखिर सच क्या है? आइए इसे उदाहरण से समझते है!
धर्म का अर्थ: संक्षिप्त में

इस ब्रह्माण्ड में अनंत वस्तुएं है, जैसे – पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर, मनुष्य, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, आदि। सभी के अपने-अपने गुण है, जिनके कारण उनका अस्तित्व संभव है।
जैसे – चीनी की अगर बात करें तो चीनी भी एक वस्तु है। तो रूप, रंग, आकार, स्वाद और सुगंध इसके गुण कहलाएंगे।
इसी प्रकार संसार की हर एक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी वस्तु में गुण होते है।
ये गुण मूल रूप से दो प्रकार के होते है –
- आवश्यक गुण (Essential Property)
- अनावश्यक गुण (Non-Essential Property)
आवश्यक गुण किसी भी वस्तु का वह गुण होता है जो वस्तु के हर प्रकार (type) मे उपस्थित होता है, जिसके होने से उस वस्तु का अस्तित्व संभव हो पाता है।
जैसे की हमे चीनी के भी अलग-अलग प्रकार देखने को मिलते है, सफेद चीनी, ब्राउन शुगर, पाउडर चीनी, शुगर सिरप, गुड़, आदि। इन सभी में एक आवश्यक गुण है जो उसे चीनी बनाता है, वह गुण है उसकी मिठास, तो ‘मिठास’ चीनी का धर्म कहलाएगी।
ठीक इसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी विषय-वस्तुएँ है, इन सभी में एक आवश्यक गुण है जो सभी में विद्यमान यानि उपस्थित है, जिसके होने से सभी का अस्तित्व संभव है, उसे ही ‘धर्म’ कहते है। जो इस सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है, जो इस सृष्टि के कण-कण में उपस्थित है।
धर्म की गलत धारणा

ज्यादातर लोग धर्म के नाम पर सिर्फ अपनी-अपनी मान्यताओं की ही बात करते है, जबकि ये सिर्फ धर्म के अलग-अलग पहलू है, जिनके जरिए हम उस ‘मूल धर्म’ को समझने का और उस तक पहुचने का प्रयास कर पाते है।
लोग अपनी मान्यताओं को ही धर्म इसलिए समझ लेते है क्योंकि प्राकृतिक रूप से मनुष्य की बुद्धि और सोचने का दायरा बहुत सीमित होता है, इसलिए हम ‘धर्म’ को भी सीमित और छोटा कर देते है।

जिस प्रकार एक कुएं के मेंढक के लिए कुआं ही पूरा संसार होता है, वैसे ही मनुष्य जिस परिवेश या परंपरा में पलता है, वह उसे ही धर्म समझ लेता है। वह कभी जान ही नही पाता कि ‘धर्म’ सिर्फ किसी एक पंथ या संप्रदाय तक सीमित नहीं है।
इसलिए ज्यादातर मनुष्य, धर्म के व्यापक और वास्तविक अर्थ को समझने से वंचित रह जाते है।
आज धर्म के नाम पर जितना लड़ाई, दंगा हो रहा है, वह सिर्फ अपनी-अपनी मान्यताऐं है, क्योंकि धर्म तो एक ही होता है और मतभेद तो अनेकता में ही उत्पन्न हो सकता है।
मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि ये सब झूठ है। मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है की हमने धर्म को सीमित करके, उसके बहुत छोटे अर्थ को सत्य मान लिया है। बस यही सारी समस्या की जड़ है।
निष्कर्ष
मुझे पता है आप लोगों के मन में धर्म को लेकर बहुत प्रश्न उठ रहे होंगे क्योंकि धर्म को समझना एक कठिन विषय है। किसी के लिए भी एक बार में धर्म को समझ पाना आसान नही है।
हम आगे लेखों के माध्यम से एकदम सरल तरीके से धर्म के वास्तविक अर्थ को समझने का प्रयास करेंगे जो किसी देश, काल, परिस्थिति, जाति, संप्रदाय, पंथ, मजहब तक सीमित नहीं है, जो सबके लिए एक समान है, सार्वभौमिक यानि यूनवर्सल है।
