इस लेख में हम वेदान्त की दृष्टि से जीवन के कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों का सरल और तार्किक उत्तर समझेंगे।
हम जानेंगे कि मनुष्य के जीवन में दुख क्या है, और मनुष्य अपने दुखों के लिए बाहरी परिस्थितियों को जिम्मेदार क्यों ठहराता है।
साथ ही हम समझेंगे कि वेदांत का उद्देश्य क्या है, वेदांत को समझने के लिए जरूरी नियम क्या हैं, और सत्य को समझने के लिए मन को किस प्रकार तैयार करना आवश्यक है।
हम यह भी जानेंगे कि मनुष्य की पहली मांग क्या है, मनुष्य सुरक्षा क्यों चाहता है, और सुरक्षित होने के बाद भी वह असंतुष्ट क्यों रहता है।
इसके बाद हम समझेंगे कि मनुष्य की दूसरी मांग क्या है, भोग-विलास करने के बाद भी मनुष्य पूरी तरह शांत क्यों नहीं हो पाता, और मनुष्य की तीसरी मांग क्या है।
अंत में हम वेदान्त के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि वास्तव में मनुष्य की एकमात्र मांग क्या है, और वेदांत के 3 मूल प्रश्न क्या हैं, जिनका उत्तर जानना प्रत्येक जिज्ञासु के लिए आवश्यक है।
यदि आप वेदान्त को बिल्कुल सरल भाषा में, तर्क और जीवन के व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है।
मनुष्य जीवन में दुःख
हम सभी अपने जीवन में किसी न किसी बात से दुःखी और परेशान रहते ही रहते हैं।
ऐसा कोई नहीं है जो अपने आप से पूरी तरह संतुष्ट हो!
चाहे हमारी समस्या धन को लेकर हो, संबंधों को लेकर हो, नौकरी-व्यवसाय को लेकर हो, स्वास्थ्य को लेकर हो या अपने भविष्य को लेकर ही क्यों न हो!
हम किसी न किसी रूप में इनसे जूझते ही रहते है।
बाहरी परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराना
हम अपनी समस्या के लिए लोगों को, किस्मत को या परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
फेल हो गए, तो हम किस्मत को दोष देते हैं।
किसी ने साथ छोड़ दिया, तो हम उस व्यक्ति को दोष देते हैं।
व्यापार में नुकसान हो जाए, तो हम परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
और जब कोई कारण समझ में नहीं आता, तो हम व्यवस्था, समाज या सरकार को दोष देने लगते हैं।
अब अगर मै आपसे कहूँ कि हम अपने दुखों और परेशानियों के लिए खुद ही पूरी तरह जिम्मेदार है, न कि बाहरी परिस्थितियाँ और लोग!
तब हो सकता है कि आप इस बात पर विश्वास न करो और आपके मन में प्रश्न भी उठे कि आखिर हम अपनी समस्याओं के लिए स्वयं कैसे जिम्मेदार कैसे हो सकते है!
क्योंकि हमने तो बचपन से ही अपने सुख और दुख के लिए बाहरी परिस्थितियों को ही जिम्मेदार समझा है।
वेदांत का उद्देश्य
हम इस लेख और आगे के लेखों के माध्यम से यही गहराई से समझेंगे कि कैसे हमें हमारी अज्ञानता ही फसाएँ हुए है!
साथ ही हम इसका समाधान भी जानेगे, जिससे हम जीवन की हर परिस्थिति में आनंद से रह सके, चाहे कितना भी दुख, मुसीबत या परेशानियाँ क्यों न हो!
जी हाँ, ये बात सुनने में आपको अजीब लग रहा होगी कि कोई दुख में भला कैसे आनंदित रह सकता है, सुख में तो समझ आता है, लेकिन दुख में कैसे संभव है!
यही वेदांत का उद्देश्य है और हम इसी को गहराई से समझेंगे!
वेदांत को समझने के लिए जरूरी नियम
आगे बढ़ने से पहले मैं चाहूँगा कि बचपन से लेकर अब तक आपने अपने जीवन में किसी भी व्यक्ति, वस्तु या विषय से संबंधित जितनी भी मान्यताऐं बना रखी है, उन सभी को थोड़ी देर के लिए भूल जाए!
मै ये नही कह रहा हूँ कि आपकी मान्यताऐं गलत है।
मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ, उन सब को थोड़ी देर के लिए सत्य मानकर न चलें!
क्योंकि हम अपने जीवन में जो कुछ भी सीखते है वो ज्यादातर हम अपने माँ-बाप से सीखते है, दोस्तों से सीखते है, रिश्तेदारों से सीखते है, स्कूल-कॉलेज से सीखते है, फिल्मों से सीखते है और आज-कल तो हम सोशल मीडिया से सीखते है।
और तब हम उन्हीं के विचारों को सत्य समझकर अपने जीवन का आधार बना लेते हैं।
हम कभी प्रश्न भी नही करते है और करते भी है तो हमें ठोस जवाब नहीं मिल पाते है, हमे सिर्फ सतही उत्तर मिलते है और हम उन्ही से संतुष्ट हो जाते है।
ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि हमारे माता-पिता या समाज हमें जान बूझकर कुछ गलत सिखाना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने तो वही बताया जो उन्होंने अपने माँ-बाप और समाज से सीखा।
लेकिन समस्या तब होती है जब हम किसी भी मान्यता को बिना जाँचे और परखे अंतिम सत्य मान लेते हैं।
और तब ऐसे में जब कोई व्यक्ति हमारी मान्यताओं के विरुद्ध कोई बात कहता है, तो उसे समझने के बजाय हम तुरंत उसका विरोध करने लगते हैं।
हमारे भीतर द्वेष और क्रोध का भाव उठता है और हम कुतर्क करने लग जाते हैं।
इसमें कुछ भी बुरा मानने वाली बात नहीं है क्योंकि ये बहुत स्वाभाविक सी बात है हम सभी के जीवन में।
आमतौर पर हर व्यक्ति अपना जीवन ऐसे ही जीता है, इसलिए हमें भी ऐसे ही जीवन जीना सत्य लगने लगता है।
तो हम अपनी मान्यताओं और अनुभवों को लेकर ही ईमानदारी से प्रश्न करेंगे और उनके माध्यम से ही सत्य को समझने का प्रयास करेंगे!
इस लेख में कही जाने वाली हर एक बात, पहले कही जाने वाली बातों पर ही निर्भर होगी।
अगर आप इस लेख को बीच से पढ़ने का प्रयास करेंगे तो आपको सही से समझ नहीं आएगा।
इसलिए आपको हर एक बात बहुत ध्यान से सुननी है और अगर इस दौरान आपके मन में कोई प्रश्न उठता है तो अपना धैर्य बनाए रखें क्योंकि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, वैसे-वैसे आपको आपके प्रश्नों के उत्तर खुद ही मिलने लगेंगे।
सुरक्षा: मनुष्य की पहली मांग
अब अगर मैं आपसे पूछूँ कि इस दुनिया में हर एक मनुष्य चाहे वह कैसा भी हो या कहीं भी हो!
देश में हो या विदेश में हो, गाँव में हो या शहर में हो, अमीर हो या गरीब हो, किसी भी जाति, धर्म, पंथ, मजहब या अन्य किसी विचारधारा का क्यों न हो,
वह सबसे पहले क्या चीजें चाहता है?
तो आप कहेंगे, सभी मनुष्य सबसे पहले खाने के लिए खाना, पहनने के लिए कपड़े और रहने के लिए छत, यानि जो बुनियादी जरूरतें (basic needs) है, उन्हें चाहता है।
ये कोई इच्छाएँ नहीं हैं, बल्कि हमारी मूल जरूरते हैं जिनसे हम अपने आप को जीवित और सुरक्षित रख पाते है।
भोजन हमें जीवित रखता है, कपड़े हमें मौसम और बाहरी परिस्थितियों से बचाते हैं, घर हमें सुरक्षा देता है।
यानि ये सब हमारी सुरक्षा के संसाधन हैं।
इसलिए अगर एक शब्द में कहा जाए तो हर मनुष्य सबसे पहले अपनी ‘सुरक्षा’ (Security) ही चाहता है।
आखिर मनुष्य सुरक्षा क्यों चाहता है?
तो सीधी सी बात है, हम खुद को लेकर असुरक्षित यानि Insecure महसूस करते है, इसलिए हम सबसे पहले अपनी सुरक्षा चाहते है।
जब हमें भूख लगती है, तब हमारा मन अशांत रहता है और तब हमें अंदर से बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है। हम खुद को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।
उसी प्रकार जब हमारे पास कपड़े नही होते और रहने के लिए घर नही होता है, हम तभी भी खुद को लेकर असुरक्षित महसूस करते है।
इसके अलावा हमारा जीवन पूरी तरह अनिश्चितताओं (uncertainity) से भरा हुआ होता है।
हमें नहीं पता होता कि अगले पल क्या होने वाला है, हमारे साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है।
कोई बड़ी बीमारी हो सकती है, कोई हादसा हो सकता है या कोई आर्थिक संकट हो सकता है।
और तब हम इन बातों को लेकर भी हर पल डरा हुआ और असुरक्षित महसूस करते हैं।
यही कारण है कि हम अपनी सुरक्षा के लिए धन की तरफ जाते है क्योंकि धन से हमें अपनी सुरक्षा के सभी संसाधन प्राप्त होते है।
उसके बाद ही हम अपने को लेकर सुरक्षित महसूस करते हैं और हमारे मन को शांति मिलती है।
मन शांत होते ही हमें अपने भीतर सुख का अनुभव होता है और हम अच्छा महसूस करते हैं।
अब अगर हम ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि हमारी सुरक्षा का संबंध सुख से ही है।
यानि हम अपनी सुरक्षा इसलिए चाहते है क्योंकि हम अपने लिए सुख चाहते है, सुख में हमें अच्छा महसूस होता है।
अब सारा खेल इसके बाद से शुरू होता है, इसलिए ध्यान से समझिएगा।
सुरक्षित होने के बाद भी असंतुष्टि
मान लीजिए हमने अपने आप को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया।
हमारे पास पर्याप्त खाने को खाना है, तन ढकने को कपड़े है और रहने के लिए सुरक्षित घर-मकान है।
इसके अलावा भविष्य की सुरक्षा को लेकर हमारे पास जरूरत से ज्यादा धन भी है।
यानि हम अपने आप को जितना सुरक्षित कर पाते है, उतना सुरक्षित कर लेते हैं।
अब अगर मैं आपसे पूछूँ कि अपने आपको सुरक्षित करने के बाद क्या हम पूरी तरह शांत हो जाते हैं?
क्या हम कभी ऐसा कहते है कि “अब मैं सुरक्षित हो गया हूँ, इसलिए अब मुझे कुछ भी नही चाहिए, अब मेरा मन पूरी तरह शांत है!”
नहीं, हम कभी भी ऐसा नहीं कहते हैं। हमारा मन तब भी अशांत ही रहता है।
यानि अपने आपको सुरक्षित करने के बाद भी हम पूरी तरह शांत नहीं हो पाते हैं।
जब हम खुद को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे थे, हम तब भी अशांत थे, लेकिन अब जब हम पूरी तरह सुरक्षित सुरक्षित हो गए है, हम तब भी अशांत ही है।
हमारे भीतर एक बेचैनी, एक अपूर्णता बनी ही रहती है, भले ही हम अपने आपको धन से कितना भी सुरक्षित क्यों न कर लें!
काम: मनुष्य की दूसरी मांग
तब हम ‘काम’ की तरफ यानि भोग-विषयों की तरफ जाते हैं, ये सोचकर कि हमारा मन वहाँ पूरी तरह शांत हो जाएगा।
अब जरा अपने चारों तरफ देखिए, आपको हर जगह कामना पूर्ति का बाजार लगा हुआ नज़र आएगा।
हर व्यक्ति जिसकी मूल ज़रूरतें पूरी हो गई हैं, भोग-विलास करता हुआ ही नज़र आएगा।
जिसके कुछ सामान्य उदाहरण है –
अत्यधिक स्वादिष्ट खाने-पीने की वस्तुएँ
महंगे कपड़े, आभूषण और फैशन का प्रदर्शन
आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियाँ और कीमती वस्तुएँ
फिल्में, पार्टियाँ, क्लब
यात्रा, रिसॉर्ट और पर्यटन
गेम, सोशल मीडिया आदि!
अब अगर हम यहाँ भी ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारे भोग-विलास करने का संबंध भी सुख से ही है।
क्योंकि हम जब भी भोग-विलास करते हैं तो हमें उसमें सुख का अनुभव होता है और हमें भीतर से अच्छा महसूस है।
इसलिए हम भोग-विषयों के माध्यम से भी अपने लिए सुख ही चाहते हैं।
भोग-विलास के बाद भी असंतुष्टि
मान लीजिए हम जितना भोग-विलास कर सकते है, हमने उतना भोग-विलास भी कर लिया।
अब अगर आपसे पूँछा जाए कि, इतना विषयों का भोग करने के बाद भी क्या हमारा मन पूरी तरह शांत हो जाता है?
क्या हम कभी ऐसा कहते है कि, अब मै भोग-विलास करके पूरी तरह संतुष्ट हो गया हूँ?
नहीं, हम कभी ऐसा नहीं कहते है, हम उसके बाद भी अशांत ही रहते हैं।
क्योंकि हम जब भी कोई विषय-भोग करते है तो हमें थोड़ी देर के लिए सुख का अनुभव होता है और इसलिए हमें लगता है कि इस सुख से हमारे भीतर की जो अपूर्णता है, जो बेचैनी है और पाने की, वो खत्म हो जाएगी और हम पूरी तरह शांत हो जाएंगे।
और तब हम इस उम्मीद में अपनी सामर्थ्य अनुसार विषय भोग करने लग जाते है, लेकिन हम उसके बाद भी अपने भीतर के खालीपन को कभी भर नही पाते है, हमारा मन उसके बाद भी अशांत ही रहता है।
भले ही हम कितना भी भोग-विलास क्यों न कर ले!
नैतिकता (धर्म): मनुष्य की तीसरी मांग
तब हम नैतिक जीवन की तरफ भी जाते है, हम उपलब्धियां प्राप्त करते है।
हम अपने आपको दूसरों की नजरों में बुद्धिमान, कामयाब, ताकतवर, ईमानदार, मेहनती या महान दिखाने की कोशिश करते है।
क्योंकि कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त करके जो हमे सुख और संतोष मिलता है, वह भोग-विलास से मिलने वाले सुख की तुलना में ज्यादा लंबे समय तक रहता है।
इसलिए हमें लगता है कि इससे तो हमारा मन पूरी तरह शांत हो ही जाएगा।
यही कारण है कि कोई अभिनेता बनना चाहता है तो कोई अधिकारी बनना चाहता है।
कोई कला के क्षेत्र में जाना चाहता है, तो कोई खेल के क्षेत्र में जाना चाहता है।
कोई डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक बनना चाहता है तो कोई उद्योगपति बनना चाहता है।
कोई कुछ बनना चाहता है, तो कोई कुछ बनना चाहता है।
लेकिन उसके बाद भी हम अपने आप से असंतुष्ट ही रहते हैं और हमारे भीतर की अपूर्णता बनी ही रहती है।
निष्कर्ष
आपको एक बात तो अच्छे से समझ में आ रही होगी कि, कोई भी मनुष्य अपने लिए दुख नहीं चाहता है, हर मनुष्य अपने लिए सुख ही चाहता है।
यानि हम अपने जीवन में जो कुछ भी करते है, उसके माध्यम से हम सिर्फ अपने लिए सुख ही चाहते है, क्योंकि सुख में हमे अच्छा महसूस होता है और दुख में नही होता है इसलिए हम सिर्फ सुख ही चाहते है।
यही कारण है कि हम जीवन भर विषयों के पीछे भागते रहते है। कभी अपनी जरूरतों में, कभी भोग-विषयों में, तो कभी नई-नई उपलब्धियों में, क्योंकि हम विषयों को ही सुख का स्रोत समझते है।
लेकिन इसके बाद भी हम पूरी तरह शांत नहीं हो पाते है, क्योंकि हमें जो विषयों में सुख का अनुभव होता है वह क्षणिक यानि त Temporary होता है।
एक वक्त के बाद उस सुख के अनुभव का अंत हो जाता है और तब हम फिर से सुख के लिए दूसरे विषयों के पीछे इस उम्मीद में भागते है कि अगला विषय हमे पूरी तरह शांत कर देगा।
ये प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है, लेकिन फिर भी हमारे भीतर की अपूर्णता कभी भी खत्म नहीं होती है।
हमारे बार-बार विषयों के पीछे भागने का कारण ही यही है कि हमें सुख तो चाहिए लेकिन क्षणिक नही, बल्कि स्थाई सुख यानि Permanent Happiness चाहिए, जो हमे पूरी तरह शांत कर दे!
वेदांत के 3 मूल प्रश्न
इतना सब कुछ जानने के बाद, अब यहाँ से 3 महत्वपूर्ण प्रश्न उठते है!
पहला प्रश्न
हमारे भीतर ये अपूर्णता, ये अशांति, ये खालीपन, आखिर है ही क्यों?
आखिर क्यों हमे हमेशा किसी चीज की कमी महसूस होती रहती है?
दूसरा प्रश्न
हमारे बार-बार विषयों के पीछे भागने पर भी ये अपूर्णता कभी खत्म क्यों नहीं होती है?
भले ही हम अपने आपको कितना भी सुरक्षित करले, कितना भी भोग-विलास करले, कितनी भी उपाधियाँ-उपलब्धियां प्राप्त करले, लेकिन हमारे भीतर की ये अपूर्णता कभी खत्म क्यों नही होती है?
तीसरा प्रश्न
कैसे हम अपने भीतर की ये अपूर्णता खत्म करके स्थाई सुख यानि Permanent Happiness प्राप्त कर सकते है?
आगे के भागों में हम इन्हीं प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करेंगे!
🙏 हरि ॐ!
